सरकारी स्कूल शिक्षा देने के नाम पर जीरो
बुलंदशहर, आनन्द शर्मा। महंगाई और बेरोजगारी के चलते गरीब मजदूर अपने नौनिहालों को प्राथमिक शिक्षा दिलाएं तो कैसे ? जग-जाहिर है ही कि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में सरकार से वेतन अच्छा खासा मिलने से अध्यापकों की स्थिति तो मजबूत देखने को मिलेगी लेकिन नौनिहालों को शिक्षा देने के प्रति गम्भीर न होने की वजह से सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढाने की बजाय निजि स्कूलों में पढाई कराने का चलन बढा है, जिसका भरपूर फायदा नीजि स्कूलों के संचालक अच्छी शिक्षा देने के सपने दिखा कर अभिभावकों की जेबों पर खुलेआम डांका डाल उठा रहे हैं और संबंधित शिक्षा विभाग और प्रशासन ऐसे शिक्षा माफियाओं के आगे नतमस्तक प्रतीत होते हैं !
ऐसा इसलिए लगता है कि रोजमर्रा में अभिभावकों के द्वारा कहीं न कहीं सरकारी प्राथमिक शिक्षा स्कूलों में पढाई न होंने की तथा नीजि स्कूलों में पढाई कराने की एवज में मनमानी फीस वसूलने की शिकायत की जाती है लेकिन न तो सरकारी प्राथमिक शिक्षा स्कूलों में पढाई का स्तर निखरा है और न ही शिक्षा माफियाओं पर अंकुश लगा है, आखिर सरकार की बेबसी का कारण हो सकता है क्या ?
सरकारी प्राथमिक शिक्षा स्कूलों की काया पलट के लिए वास्तव में यदि सरकार गम्भीर है तो एक तरफ सरकारी मुलाजिमों के लिए सिर्फ एक ही कानून बनाए कि सभी को अपने बच्चों की प्राथमिक शिक्षा सरकारी प्राथमिक स्कूलों में कराना अनिवार्य होगा, वहीं दुसरी तरफ संचालित निजि स्कूलों का हर माह निरिक्षण होना चाहिए और आय – व्यय के साथ साथ सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों को तालिम देने वाले अध्यापक/ अध्यापिकाओं की शिक्षा क्या है और वेतन संचालक द्वारा कितना दिया जाता है ? साथ ही देखना होगा कि ऐसे नीजि स्कूलों में पढाई करने वाले बच्चे टयूशन तो नहीं पढते , संबंधित शिक्षा विभाग में पंजीकृत हैं भी या नहीं ! साथ ही सरकार को चाहिए कि कानून बनाकर सभी स्कूलों में एक समान शिक्षा के लिए एक समान किताबें होना अनिवार्य करे!
सामाजिक संस्थाओं को भी इस विकराल समस्या की ओर ध्यान देना होगा और उसके लिए शिक्षा माफियाओं पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन का सहयोग करना जनहित में एक अच्छी पहल रहेगी !
समाचार/विज्ञापन के लिए संपर्क करें। 9528379242

