बुलंदशहर – कहावत चरितार्थ है कि चांदी का जूता चांद गर्म, ऐसा ही कुछ वन विभाग के बारे में देखने और सुनने को मिल रहा है ! हांलाकि विभाग में कार्यरत सभी पर उंगलियां उठाना ठीक नहीं रहेगा लेकिन हाँ कुछ वन विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारी अपने पद का दुरुपयोग करते हुए विभाग के राजस्व को चूना लगा रहे हैं।
जो धन विभाग के राजस्व में जमा होना चाहिए उसमें से ज्यादातर रिश्वतखोर वनकर्मियों की जेबों में जा रहा है और अपने पद की गरिमा के प्रति समर्पित ईमानदार अधिकारी एवं कर्मचारी चाहकर भी अपने विभाग के भ्रष्टाचार में लिप्त वनकर्मियों पर अंकुश लगा पाने में विफल तो दिखते ही हैं साथ ही शर्मसार हो रहे हैं !
सर्वविदित है ही कि सरकार द्वारा प्रतिबंधित हरे पेड़ों का अवैध कटान कानूनी जुर्म है लेकिन लकडी माफियाओं द्वारा प्रतिदिन अनुमानतम सैकडों से भी ज्यादा प्रतिबंधित हरे पेड़ों का अवैध कटान करके लकडी आढतों पर लाकर बेखोफ बेची जा रही है, सवाल उठता है कि आखिर किस के दम पर लकडी माफिया कानून का उल्लंघन कर प्रतिबंधित हरे पेड़ों का अवैध कटान करने में जुटे हैं ।
सूत्रों से मिली जानकारी को सही माने तो गत 29 व 30 अक्टूबर 2025 को वन विभाग की सदर रेंज में बुलंदशहर के ही वन विभाग के अधिकारी ( डिप्टी रेंजर ) ने गांव कोलसैना क्षेत्र से अवैध कटान करके लकडी आढतों पर लाई जा रही आम के पेड़ों की लकडी से भरी ट्रैक्टर ट्रालियां पकडीं तो जरूर लेकिन नतीजा रहा कि जुर्माना तो किया गया, करना भी चाहिए था किन्तु किए गए जुर्माने की कुल धनराशि में से आधे की रसीद ही देने की शर्त पर आम की लकडी से भरी ट्रेक्टर ट्रालियां छोड दीं।
अब सवाल उठता है कि जुर्माना की आधी धनराशि की तो सरकारी रसीद आज नहीं तो कल मान लो दे भी दी मगर शेष आधी धनराशि का रहेगा क्या ? इतना ही नहीं हैरतअंगेज कारनामा देखिए आम के बाग से आम के पेड़ों का अवैध कटान हुआ, बाग के सहभागी की सूचना पर पुलिस और वन विभाग का अधिकारी मौके पर पहुंचे लेकिन हुआ क्या, लाखों जुर्माना करने की धमकी तो दी गई मगर यहाँ भी वन अधिकारी ने खेला कर दिया, सूत्रों के मुताबिक 30 हजार रुपये में मामला निबटाने की अपुष्ट खबर है।
इतना ही नहीं बाग में जहां जहां आम के पेड़ों का अवैध कटान किया गया वहां की भूमि की जुताई कराने को कहा जिससे मौके पर कटान होने का साक्ष्य मिटाया जा सके ! सच उजागर हो सकता है बशर्ते जहाँ जहाँ हुए अवैध कटान पर जुर्माना किया गया है वहां मौके पर जाकर किसी ईमानदार अधिकारी से जांच कराई जाए !वनविभाग के ही सेवानिवृत्त एक अधिकारी का उक्त पर कहना रहा कि घूंसखोरी चरमसीमा पर है।
सही मायने में आम के पेड़ों के अवैध कटान की लकडियों से भरी ट्रैक्टर ट्रालियां जपत कर मुकदमा दर्ज करना था लेकिन ऐसा किया नहीं, क्यों ? सभी समझते तो हैं लेकिन भ्रष्टाचारियों व लकडी माफियाओं से पंगा लेवे कौन ? इससे तो यही प्रतीत होता है कि कानून के रक्षक ही बनें हों भक्षक तो कानून का उल्लंघन करने वालों पर शिकंजा कसे तो कैसे ?
